बड़ा पद, बड़ा भ्रष्टाचार हो तो बड़ी सजा होनी ही चाहिए
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: राजनीति में प्रशासन में भ्रष्टाचार सबसे बड़ी व गंभीर समस्या है। इस समस्या का समाधान कोई सरकार निकाल नहीं पाती है क्योंकि भ्रष्टाचार अब व्यक्तिगत से सामूहिक हो चला है। इससे एक तो लंबे समय तक भ्रष्टाचार का पता नहीं चल पाता है क्योंकि सभी मिलकर भ्रष्टाचार करते हैं तो भ्रष्टाचार शिष्टाचार हो जाता है क्योंकि कोई भ्रष्टाचार के बारे में किसी को कुछ बताता नहीं है, किसी को बताएगा तो खुद भी भ्रष्टाचार के मामले में सजा पाएगा। जब व्यक्तिगत तौर पर भ्रष्टाचार होता है तो उसे जानने व बताने वाले भी बहुत होते हैं।जैसे कोई घूस लेता है तो घूस लेने वाला घूस को छिपा नहीं सकता है क्योंकि जिसने घूस दिया है वह तो जानता है कि कौन काम के लिए घूस लेता है।लेकिन जब सरकारी पैसों का भ्रष्टाचार होता है तो सब मिलकर सरकारी पैसे का भ्रष्टाचार करते हैं तो सबको पैसा मिलता है इसलिए जानने वाले चुप रहते हैं और कोई बताने वाला होता नहीं है।
सरकार किसी भी राजनीतिक दल की हो वह खुद को भ्रष्टाचार विरोधी तो बताती है लेकिन उसके शासन में हर तरह का भ्रष्टाचार होता रहता है।घूसखोर कर्मचारियों व अधिकारियों को तो शिकायत पर पकड़ा जाता है लेकिन जिन अफसरों की शिकायत नहीं होती है, वह सरकारी पैसों का भ्रष्टाचार करते हुए अपने पद पर बने रहते हैं। शिकायत होती भी है तो ऊपर तक सेटिंग रहने पर कोई कार्रवाई नहीं होती है। हर सरकार में ऊपर से नीचे तक सरकारी पैसों का जो भ्रष्टाचार किया जाता है, उसका पूरी ईमानदारी से बंटवारा होता है। पिछली सरकार में हुआ शराब घोटाला हो या सट्टा घोटाला हो,कोल घोटाला हो,सब सरकारी पैसाें का ही तो भ्रष्टाचार था।करने वालों में ऊपर से नीचे तक लोग शामिल थे क्योंकि यह सामूहिक भ्रष्टाचार था। इसका पता अक्सर सरकार बदलने के बाद चलता है और यही हुआ है। सरकार बदली तो पता चल रहा है कि ऊपर से नीचे तक सब भ्रष्टाचार में लिप्त थे। माना जाता है ऐसा तब ही होता है जब सरकार ही अपने लोगों के जरिए भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली होती है।
सामूहिक भ्रष्टाचार में सब समान अपराध करते हैं।सरकारी पैसों का भ्रष्टाचार करते हैं।सामूहिक भ्रष्टाचार में करोड़ो रुपए मिलते हैं, इतना पैसा मिल जाता है कि जिंदगी भर कमाने की जरूरत न रहे इसलिए ऐसे लोग नौकरी की परवाह नहीं करते मौका मिले तो एकमुश्त पैसा कमा लेना चाहते हैं।ऐसे लोगों को सजा कम मिलती है या इतनी देर से मिलती है कि उसका कोई मतलब नहीं रह जाता है। इसे रोकने के लिए सरकार को भी सुप्रीम कोर्ट की तरह सोचना चाहिए और जिस पद पर रहकर अपराध किया है उस पद के हिसाब से उसको सजा भी ज्यादा मिलनी चाहिए।अगर वह छोटे पद पर है तो कम सजा मिलनी चाहिए और बड़े पद पर है तो उसे बड़ी सजा मिलनी चाहिए।सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि पद जितना ऊंचा,जवाबदेही उतनी ही अधिक,गबन जैसे मामले में उसको सहकर्मियों जैसी हल्की सजा नहीं दी जा सकती क्योंकि पद के हिसाब से सजा बदल सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को दरकिनार करते हुए पंजाब व सिंध बैंक के वरिष्ठ प्रबंधक की सेवा से बर्खास्तगी को सही ठहराया है।मामले के मुताबिक वरिष्ठ प्रबंधक ने अपने अधीनस्थ बैंक अधिकारी और एक गनमैन के साथ मिलकर ग्राहकों के पैसे का गबन किया और बैंक रिकार्ड में हेरफेर की। जांच में यह आरोप सही पाया गया। इस पर बैंक ने वरिष्ट प्रबंधक को सेवा से बर्खास्त कर दिया।जबकि सहआरोपियों के वेतन में कटौती व अनिवार्य सेवनिवृत्ति जैसी हल्की सजा दी।इस पर बैंक प्रबंधक हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने इसे भेदभाव मानते हुए प्रबंधक की सजा को बर्खास्तगी से बदलकर अनिवार्य सेवानिवृत्ति कर दी।मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने भेदभाव के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि समानता का सिध्दांत हर स्थिति में लागू नहीं होता।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ प्रबंधक की जिम्मेदारी कर्मचारियों की निगरानी के साथ संस्थान में ईमानदारी बनाए रखना थी।वह ऐसा नहीं कर सके।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा है कि बड़े अधिकारी से अधिक ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है। इसलिए उसके द्वारा किए गए कदाचार को अधिक गंभीर माना जाएगा।सुप्रीम कोर्ट की तरह राजनीति व प्रशासन में भी ऐसा ही फार्मूला लागू होना चाहिए लेकिन ऐसा होता नहीं है।एक भ्रष्ट मंत्री या मुख्यमंत्री तो पूरे प्रशासन को भ्रष्ट बना देता है। वह अपने व पार्टी के लिए पैसों का जुगाड़ करने सबको भ्रष्टाचार की खुली छूट दे देता है और पूरे प्रदेश में ऐसा भ्रष्टाचार होता है जैसा कि प्रदेश में पहले कभी हुआ नहीं।एक बार किसी राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था भ्रष्ट हो जाती है तो उसे कम करना आसान नहीं होता है क्योंकि सबको भ्रष्टाचार की आदत हो जाती है और वह उसे गलत नहीं मानते हैं,वह तो उसे अपना अधिकार मानते हैं। किसी पार्टी की सरकार आती है तो पार्टी के लोगों को भी यही लगता है कि अब उनके कमाने के दिन आए हैं। पार्टी की सरकार बने तो ऐसा तो होता नहीं है कि पार्टी के सारे नेता ईमानदारी व सदाचार का उदाहरण पेश करें।
