पापाराव के सरेंडर से नक्सलवाद और कमजोर हुआ
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: बस्तर में नक्सलवाद कभी विचारधारा के तौर पर बहुत मजबूत था,नक्सलियों के बड़े नेताओं के कारण।उनके नेतृत्व में नक्सलवाद गांव-गांव तक पहुंच गया था और गांव-गांव से उनको समर्थन भी मिला करता था। संगठन के छोटे नेता व सदस्य मारे जाते थे,पकड़े जाते थे तो बड़े नेता उनकी जगह नए लोग भर्ती कर लेते थे इस तरह विचारधारा व संगठन के तौर पर नक्सली बस्तर में लंबे समय तक मजबूत रहे और अपना सामानांतर शासन चलाते रहे।ज्यादातर बड़े नेताओं के मारे जाने या सरेंडर करने से नक्सली संगठन बहुत कमजोर हो गया है। पापाराव भी एक बड़ा नक्सली नेता था, उसके साथियों सहित सरेंडर से नक्सली संगठन अब बस्तर में और कमजोर हो गया है। बड़े नेताओं के मारे जाने या सरेंडर करने से जो बचे हुए नक्सली हैं, वह भी ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि वह कुछ कर सकें। बड़े नेताओं के मारे जाने व सरेंडर करने से वह भी डरे हुए हैं और हो सकता है कि वह भी मारे जाने के खौफ से आने वाले कुछ दिनों में सरेंडर कर दें।
गृहमंत्री अमित शाह ने अगस्त २०२४ में जब यह लक्ष्य तय किया था कि मार्च-२६ तक नक्सलियों का खात्मा कर दिया जाएगा तो बहुत सारे लोगो को इस बात पर यकीन नहीं था कि दो साल में ऐसा करना संभव है क्योंकि उनका अनुभव तो यही था कि सरकारे तो आती जाती है लेकिन बस्तर में नक्सली समस्या बनी रही है। अमित शाह ने योजना बनाकर काम किया और जिसे कभी असंभव माना जाता था, उसे संभव कर दिखाया और आज की स्थिति में शायद ही कोई ऐसा हो जो यह मानता हो कि नक्सलियों का सफाया संभव नहीं है।जनवरी२४ से अब तक २३२ मुठभेड़ों में ४९९ नक्सली मारे गए हैं,१९२३गिरफ्तार किए गए हैं।२७५६ ने सरेंडर किया है।१२०० से ज्यादा हथियार व आईईडी बरामद किए गए हैं।इस अवधि में बसव राजू समेत १४ शीर्ष नक्सली नेता मारे गए हैं।
एक समय था कि कोई यकीन नहीं करता था कि शीर्ष नक्सली मारे जा सकते हैं, उनको सरेंडर करने के लिए मजबूर किया जा सकता था लेकिन अमित शाह के नक्सलियों के खात्मे का लक्ष्य तय करने के साथ ही यह सब दो साल में संभव हुआ है। शीर्ष नेताओं के मारे जाने व सरेंडर से ही नक्सलियों की कमर टूटी है।नक्सली संगठन हर तरह से कमजोर हुआ है। एक साल के भीतर केंद्रीय क्षेत्रीय आयोग प्रमुख भूपति,केंद्रीय सैन्य प्रमुख देवजी,ओडिशा प्रभारी मल्लाजी रेड्डी,आंध्रप्रदेश प्रभारी दामोदर,सीसीएम रूपेश,गंगन्ना,सुजाता,ककराला सुनीता के बाद पापाराव जैसे माओवादी ने सरेंडर कर साबित किया है कि अब बस्तर के जंगल नक्सलियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह नहीें रह गए हैं। इस जंगल में अब नक्सलवाद जिंदा नहीं रह सकता। अब स्थिति इतनी बदल गई है कि पहले बस्तर में पुलिस के जवान हो या गांवों के लोग उनमें खौफ रहता था कि वह कभी भी नक्सलियों के हाथों मारे जा सकते हैं लेकिन आज नक्सलियों में खौैफ है कि वह कभी भी पुलिस व जवानों के हाथों मारे जा सकते हैं, इसलिए वह सरेंडर कर मुख्यधारा में शामिल होना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
अमित शाह ने बस्तर में ज्यादा से ज्यादा सुरक्षा कैंप स्थापित कर सुरक्षा बलों के जवानों में यह भरोसा पैदा किया वह नक्सलियों से लड़ सकते हैं और मार सकते हैं। एक बार यह भरोसा पैदा हुआ तो सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के ठिकानों में जाकर नक्सलियों से मुठभेड की और उनको घेर कर मारना शुरू किया। नक्सलियों को खोज-खोज कर मारना शुरू किया।पिछले तीन सालो में १५० से अधिक सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए तब जाकर अबुझमाड़,जगरगुंडा और पामेड़ जैसे इलाकों में सुरक्षा बलों ने अपनी मोजूदगी का एहसास नकसलियों को कराया और यह भी एहसास कराया कि तुम अब कुछ नहीं कर सकते और हम वह सब कर सकते हैं जो तुम पहले इन इलाकाें में किया करते थे। यही वजह है कि आज बस्तर का ९५ प्रतिशत इलाका सुरक्षित माना जाता है यानी इस क्षेत्र में नक्सली अब पहले की तरह कुछ भी नहीं कर सकते। बहुत कम संख्या में नक्सली अब पांच प्रतिशत दुर्गम इलाकों में सिमट कर रह गए है। उनको कह दिया गया है कि अब कुछ दिन सरेंडर को बचे हैं,वह सरेंडर कर दें। उम्मीद है कि वह अपने बड़े नेताओं से सबक लेकर सरेंडर का ही रास्ता चुनेंगे।
राज्य सरकार ने एक तरफ नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाया तो दूसरी तरफ उनको सरेंडर करने पर उनका उचित पुनर्वास भी किया है। साय सरकार ने बार बार नक्सलियों से यही कहा है कि वह किसी पर गोली नहीं चलाना चाहते हैं, हम तो चाहते हैं कि सारे नक्सली सरेंडर कर मुख्यधारा में शामिल हो जाए तो हम उनका बेहतर पुनर्वास करना चाहते हैं।साय सरकार ने खाली बातें नहीं की जमीन पर पुनर्वास का अच्छा काम भी किया है। राज्य की पुनर्वास नीति के तहत बीते दो सालों में ५५२ सरेंडर करनेवाले नक्सलियों को नौकरी व रोजगार उपलब्ध कराया गया है।इनमें से छह लोगों की सरकारी सेवा में नियुक्ति दी गई है।जबकि अन्य को स्वरोजगार से जोड़ते हुए कई कामों लगाया गया है।आंकड़ों के मुताबिक एक जनवरी २०२४ से २८ फरवरी २६तक २६९७ नक्सलियों ने सरेंडर किया है।उनको रोजगार का प्रशिक्षण देकर इन्हें मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास सरकार कर रही है।
