आज नहीं बचाया पानी ताे कल होगी बूंद बूंद की लड़ाई: जलयोद्धा उमाशंकर पाण्डेय
नई दिल्ली{ गहरी खोज }: देश के एकमात्र जल योद्धा और पद्मश्री उमाशंकर पांडेय का कहना है कि देश की जनता यदि आज पानी का संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सचेत एवं सक्रिय नहीं हुई तो गंगा, यमुना के हमारे देश में आने वाले समय में लोगों को बूंद बूंद पानी के लिए संघर्ष करना पड़ेगा और यदि ऐसा हुआ तो इससे बड़ा अभिशाप हमारे देश और पूर्वजों के लिए और कुछ नही हो सकता।
लगभग चार दशकों से पुरखों की सीख को अमल में लाकर पानी के संरक्षण के लिए निर्विकार भाव से साधनारत उमाशंकर पाण्डेय ने उत्तर प्रदेश के बुन्देलखंड के बांदा जिले में अपने पैतृक गांव जखनी को प्रयोगशाला बनाया और उसके परिणामों की धमक देश के कोने कोने में सुनी गयी और खेत में मेड़ और मेड़ पर पेड़ का मॉडल देश में लोकप्रिय हुआ। आयु के छह दशक पूरे कर चुके उमाशंकर पाण्डेय को उनके एक पैर की दिव्यांगता रोक नहीं पायी।
उमाशंकर पांडेय ने विश्व जल दिवस की पूर्व संध्या पर हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में कहा, पानी बचाना सरकार का काम नही है। यह देश के लोगों की सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर अगर गंगा, यमुना देश में भी के आने वाले समय में लोगों को बूंद बूंद पानी के लिए लड़ना पड़े तो इससे बड़ा अभिशाप हमारे देश और पूर्वजों के लिए और कुछ नही होगा।
उन्होंने कहा कि न तो कुआं पूजने से कुछ होगा और ना ही नदी पूजने से कुछ होने वाला है। इसके लिए हम सभी को मिलकर प्रयास करना होगा। तभी हम सब पानी का बचा सकते हैं। इसके लिए देश के एक सौ 40 करोड़ लोगों को सामूहिक प्रयास करना होगा। उन्होंने कहा कि हमारे यहां कहावत है कि बूंद से बूंद से घड़ा भरता है। यदि सभी लोग सकारात्मक भाव, पूरी ईमानदारी और सच्चाई से प्रयास करें तो हमारी एक बूंद बूंद से महासागर बन जाएगा, भर जाएगा।
जखनी मॉडल के प्रणेता और जल योद्धा, पद्मश्री उमाशंकर ने कहा कि हम अब भी जागे और सतर्क हुए तो पहला विश्व भोजन के लिए हुआ था। दूसरा पेट्रोल के लिए हुआ और तीसरा पानी के लिए होना तय है, इसलिए हम सभी देशवासियों को संकल्प लेना होगा कि अपनी थाली में मात्र 10 ग्राम भोजन छोड़ने का मतलब है कि हमने 35 लीटर पानी को बर्बाद कर दिया। वे कहते हैं कि देश के लोग पानी को किसी न किसी रूप में पूजते हैं। कोई पानी को परमात्मा मानता है, कोई जगदीश तो कोई जगन्नाथ, लेकिन पानी की बर्बादी को रोकने का कोई भी सार्थक प्रयास नही करता है। अगर हम अपने पूर्वजों और उनकी बातों को भी याद करें तो वे यही कहते थे, हमें पानी देते रहना। इसका मतलब स्पष्ट है कि पानी हम सबके जीवन के जलिए कितना जरूरी है। जैन मुनि और संत भी अपने साथ पानी लेकर चलते हैं । ये सब यही दर्शाता है कि हमारे जीवन में पानी का कितना बड़ा महत्व है।
जल योद्धा उमाशंकर पांडेय बताते हैं कि हम 20 मीटर की छत पर भी हजारों लीटर पानी बचा सकते हैं। वह कहते हैं कि यदि आपके पास 20 मीटर की छत है और पांच सौ मिलीमीटर बारिश होती है तो आप 10 हजार लीटर पानी बचा सकते हैं। वे कहते हैं कि हम नहाने, कपडे धाने, खाना बनाने में ही हजारों लीटर पानी बर्बाद कर देते हैं। अगर हर व्यक्ति अपने हिस्से का प्रयास करे तो हम भरपूर पानी की बचत कर सकते हैं। वे कहते हैं कि दुनिया में 18 फीसद आबादी और केवल एक प्रतिशत ही पानी है। इसलिए अगर हम पानी के सरंक्षण के बारे में नही सोचेंगे तो इसके लिए दुनिया में युद्ध होना लाजिमी है। हम अभी से पानी को खरीद कर पीने लगे हैं। यह तो बस एक शुरुआत है।
उमाशंकर बताते हैं कि पहली बार उन्हें जल यानी पानी के महत्व के बारे में अपनी स्वर्गीय मां सुमित्रा पांडेय से पता चला कि पानी का हमारे जीवन में कितना बड़ा महत्व है। वैसा तब हमारे इलाका भी सूखा हुआ करता था और सुदूर तक पानी का नामो निशान नही था। इस कारण लोगों के पास आय का कोई साधन भी नही था। उनके गांव के तो 80 प्रतिशत लोग पलायन कर गए थे। वहां केवल अपराध ही हुआ करते थे।
वह बताते हैं कि उन्होंने अपनी मां से कहा था कि वे यह काम कैसे कर सकते हैं, तो उनकी मां सुमित्रा ने कहा था कि तुम क्यों नही कर सकते हो। उन्हाेंने कहा था कि मां से बडी मातृभूमि होती है। अगर तुम्हें कुछ करना है तो गांव और अपने इलाके में पानी को बचाना सीखो और इसका संरक्षण करो। उस समय वे गांव से बाहर से हाईस्कूल की पढ़ाई कर रहे थे। उसी समय उनके गांव में एक महिला मौत हो गई थी। उसी दौरान वे गांव गए थे। गांव में शोक होने से में घर में खाना नहीं बना था। मां ने उन्हें पास के गांव में ही भाई की ससुराल में जाकर भाेजन करके आने को कहा और अगले दिन पानी बचाने के बारे में चर्चा करने की बात कही।
इसके बाद अगले दिन मां ने उन्हें पानी के संरक्षण महत्व के बारे में बताया और इसके लिए कुछ सोचने और मेहनत करने को कहा। बस इसके बाद उन्होंने अपने साथियों के साथ पानी के संरक्षण का बीडा उठाया और वे आज इस मुकाम पर हैं कि उनका पानी के संरक्षण का जखनी मॉडल देश के 1050 ग्राम पंचायतों में लागू हो गया है जिन्हें जलग्राम कहा जाता है।
पानी के संरक्षण का जखनी मॉडल बहुत ही सामान्य और गांव देहात में पूर्वजों की सोच से उपजा बहुत सहज माॅडल है। इसमें पानी के संरक्षण और बचत के लिए ‘खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़’ लगाया जाता है। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले का जखनी मॉडल अब देश के जल संकट की ‘संजीवनी’ बन गया है। इनकी ‘खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़’ योजना ने इलाके को जल से लबालब कर दिया है।
जलयोद्धा उमाशंकर की मुहिम बुंदेलखंड की किस्मत संवारने के साथ देश के विभिन्न राज्यों के लिए आदर्श बन गई है। कभी पानी को तरसने वाला बुंदेलखंड आज न केवल लहलहा रहा है बल्कि यहां मालगड़ियों से हजारों क्विंटल बासमती धान, गेंहू, मटर, मूंग, उड़द, प्याज़ आदि खाद्यान्न देश के विभिन्न हिस्सों को भेज जा रहा है। बांदा में 2008 में सबसे पहले सौ क्विंटल और पूरे बुन्देलखंड में 500 क्विंटल बासमती धान पैदा हुआ था। आज करीब 30 लाख क्विंटल बासमती धान बांदा जिले से आता है। जबकि पूरे बुन्देलखंड में एक करोड़ क्विंटल बासमती धान की पैदावार है।
