एनबीए ने ‘आक्रामक विदेशी प्रजातियों’ पर विशेषज्ञ समिति का किया गठन

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नई दिल्ली{ गहरी खोज }: भारत की पारिस्थितिकी और कृषि के लिए गंभीर खतरा बन चुकी ‘आक्रामक विदेशी प्रजातियों’ से निपटने के लिए राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। यह कदम राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के सख्त निर्देशों और पर्यावरण मंत्रालय की सलाह के बाद उठाया गया है।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार यह निर्णय एनजीटी की ओर से (मूल आवेदन संख्या 162/2023) पर लिए गए स्वतः संज्ञान के बाद आया है। अधिकरण ने चिंता जताई थी कि विदेशी प्रजातियां न केवल हमारी देशी जैव विविधता को नष्ट कर रही हैं बल्कि खाद्य सुरक्षा, कृषि और मानव स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा जोखिम पैदा कर रही हैं। इसी के मद्देनजर एनबीए को व्यापक अध्ययन और रणनीतिक योजना बनाने का निर्देश दिया गया था।
इस समिति की अध्यक्षता आईएफएस (सेवानिवृत्त), पूर्व पीसीसीएफ और उत्तराखंड के वन बल प्रमुख धनंजय मोहन कर रहे हैं जबकि केरल मत्स्य एवं महासागर अध्ययन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर ए. बीजू कुमार सह-अध्यक्ष के रूप में कार्य करेंगे। इस समिति में प्रमुख मंत्रालयों और अग्रणी वैज्ञानिक संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी और प्रख्यात विशेषज्ञ शामिल हैं।
एनबीए ने ‘जैविक विविधता अधिनियम, 2002’ के तहत इस समिति को कई महत्वपूर्ण कार्य सौंपे हैं। इनमें राष्ट्रीय सूची तैयार करना, जोखिम मूल्यांकन, प्रबंधन रणनीतियां और अनुसंधान और डेटा शामिल है। आक्रामक विदेशी प्रजातियां (जैसे लैंटाना, जलकुंभी आदि) भारतीय जंगलों और जल निकायों को तेजी से निगल रही हैं। इस समिति का दो वर्ष का कार्यकाल भारत की वैश्विक जैव विविधता प्रतिबद्धताओं को पूरा करने और देश के पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने में मील का पत्थर साबित होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह ‘समग्र सरकारी दृष्टिकोण’ न केवल पर्यावरण की रक्षा करेगा बल्कि किसानों की आय और ग्रामीण आजीविका को भी सुरक्षित करेगा।

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