रेलवे की दो मल्टीट्रैकिंग परियोजनाओं को मंजूरी, पश्चिम बंगाल व झारखंड में 192 किमी नेटवर्क का होगा विस्तार

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नई दिल्ली{ गहरी खोज },: केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति (सीसीईए) ने मंगलवार को रेल मंत्रालय की दो मल्टीट्रैकिंग परियोजनाओं को मंजूरी दी। इनकी कुल अनुमानित लागत 4,474 करोड़ रुपये है और इन्हें वर्ष 2030-31 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने यहां राष्ट्रीय मीडिया सेंटर में संवाददाता सम्मेलन में मंत्रिमंडल के फैसलों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में स्वीकृत परियोजनाओं में सैंथिया–पाकुड़ चौथी लाइन (81 किमी) तथा संतरागाछी–खड़गपुर चौथी लाइन (111 किमी) शामिल हैं। इन परियोजनाओं से भारतीय रेलवे की मौजूदा नेटवर्क क्षमता में लगभग 192 किलोमीटर की वृद्धि होगी। उन्होंने संतरागाछी-खड़गपुर चौथी लाइन परियोजना को लेकर कहा कि संतरागाछी कोलकाता के चार बड़े रेलवे स्टेशनों में से एक है। इस स्टेशन पर बहुत सारा विकास कार्य चल रहा है। यह छह मंज़िला स्टेशन बनकर तैयार हो रहा है।
सरकार के अनुसार इन परियोजनाओं से रेलवे की लाइन क्षमता बढ़ेगी, जिससे परिचालन दक्षता और सेवा की विश्वसनीयता में सुधार होगा। मल्टीट्रैकिंग के माध्यम से ट्रेनों की आवाजाही अधिक सुगम होगी और रेलवे मार्गों पर भीड़भाड़ कम करने में मदद मिलेगी। ये परियोजनाएं प्रधानमंत्री गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के तहत तैयार की गई हैं, जिनका उद्देश्य मल्टी मॉडल कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स दक्षता को बढ़ाना है। इसके माध्यम से लोगों, वस्तुओं और सेवाओं की आवाजाही अधिक सुगम होगी।
दोनों परियोजनाएं पश्चिम बंगाल और झारखंड के कुल पांच जिलों को कवर करेंगी। इससे लगभग 5,652 गांवों को बेहतर रेल संपर्क मिलेगा, जहां करीब 1.47 करोड़ की आबादी निवास करती है। इन परियोजनाओं से बोलपुर-शांतिनिकेतन, नंदिकेश्वरी मंदिर (शक्तिपीठ), तारापीठ (शक्तिपीठ), पटचित्र ग्राम, धादिका वन, भीमबांध वन्यजीव अभयारण्य और रामेश्वर कुंड जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों की रेल कनेक्टिविटी भी बेहतर होगी।
सरकार के अनुसार यह मार्ग कोयला, पत्थर, डोलोमाइट, सीमेंट, स्लैग, जिप्सम, लोहा-इस्पात, खाद्यान्न, पेट्रोलियम उत्पाद और कंटेनर जैसे सामानों के परिवहन के लिए महत्वपूर्ण हैं। क्षमता विस्तार के बाद करीब 31 मिलियन टन प्रति वर्ष अतिरिक्त माल परिवहन संभव होगा। परियोजनाओं के पूरा होने से लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी, तेल आयात में लगभग 6 करोड़ लीटर की कमी आएगी तथा करीब 28 करोड़ किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी होगी, जो लगभग एक करोड़ पेड़ लगाने के बराबर है।

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