जो सत्ता में नहीं वह दिखावा ही करता है
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }:राजनीति में कई बार राजनीतिक दल खुद तो कुछ कर नहीं पाते हैं ऐसे में उनके सामने दिखावा करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है। इसलिए वह जब भी मौका मिलता है तो किसी वर्ग विशेष का हितैषी होने का दिखावा करते हैं। उनके आचार विचार से ही जनता को यह पता चल जाता है कि उसका हितैषी कौन है और कौन हितैषी होने का दिखावा कर रहा है।छत्तीसगढ़ में राजनीतिक दलों के बीच आए दिन होड़ लगी रहती है यह दिखाने की कि किसान हितैषी कौन है। जिसको जहां मौका मिलता है, वह यह बताने व दिखाने का प्रयास करता है कि हमसे बड़ा किसान हितैषी कोई नहीं है, हम सत्ता में रहे या न रहें हम किसान हितैषी है और हम ही किसान हित में काम करते रहे हैं।
विधानसभा का सत्र हो तो कांग्रेस को मौका मिलता है खुद को किसान हितैषी और सरकार को किसान विरोधी साबित करने का लेकिन वह सत्ता में नहीं है इसलिए वह किसानों के हित में कुछ कर तो नहीं सकती इसलिए वह बातों के जरिए खुद को किसान हितैषी होने का दिखावा करती है।धान खरीदी के दौरान उसने किसानों के हित में ऐसा कुछ नहीं किया जिससे किसानों को धान बेचने में आसानी हो, जिन किसानों का धान टोकन कटने के बाद भी नहीं बिका ऐसा कुछ नहीं किया कि उन किसानों को धान बिक जाता। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस को मालूम नहीं था कि राज्य के हजारों किसान तय समय पर अपना धान नहीं बेच सके हैं,मालूम था लेकिन उसने ऐसा कुछ तो किया नहीं जिससे हजारों किसान जिनका टोकन कट चुका था वह अपना धान आसानी से बेच पाते।
वह खाली सरकार से मांग करती रही कि धान खरीदी का समय बढ़ाया जाए।सरकार हर साल जो किसान तय समय में धान नहीं बेच पाते हैं, उनके लिए कुछ दिन बढ़ाती रही है,इस बार भी सरकार ने दो दिन धान खरीदी का समय बढ़ाया था ताकि जो किसान धान नहीं बेच सके हैं,वह अपना धान दो दिन में बेच सकें। इसके बाद भी यदि किसान अपना धान नहीं बेच सके हैं तो इसके लिए सरकार कहां दोषी है। विधानसभा मे्ं विधायक लखेश्वर बघेल ने धान खरीदी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि बस्तर संभाग के ४४६१२ किसान धान नहीं बेच पाए।जवाब में खाद्य मंत्री दयालदास बघेल ने वही कहा जो हर सरकार का खाद्य मंत्री कहता कि जितने किसान सोसायटी धान बेचने आए उनका धान खरीदा गया है। यही भाजपा सरकार हो या कांग्रेस सरकार हो यही प्रक्रिया है और ऐसा होता है।
पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने अपने सवाल के जरिए यह जताने की कोशिश की साय सरकार के समय पंजीकृत व ऋणी किसानों का धान भी नहीं खरीदा गया है। इस पर मंत्री ने साफ कर दिया कि पंजीकृत किसान व ऋणी किसानों का धान तो पूर्व सरकार के समय भी शतप्रतिशत नहीं खरीदा गया था। यह सच भी है क्योंकि जितने किसान पंजीयन कराते है,सबका धान तो कोई भी सरकार हो खरीदा नही जाता है। इसी तरह सभी ऋणी किसानों का धान भी खरीदा नहीं जाता है क्योंकि वह सोसायटी बेचने ही नहीं आ पाते हैं। पंजीकृत व ऋणी किसान होने या टोकन कट जाने का मतलब यह तो होता नहीं है कि उसका धान सरकार अनिवार्य रूप से खरीदेगी,वह सोसायटी आएगा तो ही सरकार धान खरीदेगी।
कवासी लखमा ने अपने सवाल के जरिए खुद को बड़ा किसान हितैषी बताने का प्रयास करते हुए कहा कि पंजीयन व टोकन कटने के बाद भी किसानों का धान नहीं खरीदा गया।ऐेसे किसानों का अब क्या होगा, उनका कर्ज कौन पटाएगा।उन्होंने सरकार से मांग की कि सरकार ऋणी किसानो का धान खरीदे या उनका कर्ज माफ करे।यह कांग्रेस का किसान हितैषी करने का दिखावा था क्योंकि वह जब सरकार में थी तो उसने तो ऐसा किया नहीं था कि ऋणी किसानों का धान अलग से खरीदा हो, या ऐसा नहीं करने पर उसने ऋणी किसानों का कर्जा माफ किया था।उसने अपने समय में खुद ऐसा नहीं किया और खुद को किसान हितैषी बताने के लिए साय सरकार को ऐसा करने को कह रही है।कांग्रेस सरकार के समय भी जो किसान साेसायटी आते थे उनका धान खरीदा जाता था और साय सरकार के समय भी यही किया गया है तो इसके लिए कांग्रेस साय सरकार की आलोचना कैसे कर सकती है कैसे कह सकती है कि उसने सब किसानों का धान नहीं खरीदा।
