इरविन खन्ना संपादकीय { गहरी खोज }: सीबीआई द्वारा दिल्ली शराब घोटाले को लेकर न्यायालय में दी गई चार्जशीट को न्यायालय ने जिस तरह खारिज किया और साथ में शराब नीति की जांच कर रहे अधिकारी विरुद्ध विभागीय जांच करने के आदेश दिए हैं, उससे राष्ट्र स्तर की जांच एजेंसी सीबीआई खुद कटघरे में खड़ी दिखाई दे रही है। न्यायालय के आदेश से एक बार फिर उस धारणा को मजबूती मिली है जिस अनुसार जांच एजेंसियां केंद्र सरकार की कठपुतली मात्र हैं, जो भ्रष्टाचार के नाम पर विपक्षी दलों को निशाने पर लेती है। साख बचाने के लिए सीबीआई ने भले ही फैसले को तत्काल हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन इसने प्रीमियम जांच एजेंसी की पूरी कार्यप्रणाली यानी जांच, चार्जशीट तैयार करने और ट्रायल में केस की पैरवी तक की खामियों को उजागर कर दिया है। एक के बाद एक कई मामलों में आरोपितों के विरुद्ध ठोस सुबूतों के साथ चार्जशीट दाखिल करने और सजा दिलाने में नाकामी किसी चूक की तरफ नहीं, प्रणालीगत विफलता को रेखांकित कर रही है। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, सीबीआइ का पूरा जोर सुबूतों को खोजने के बजाय जल्दबाजी में चार्जशीट दाखिल कर केस निपटाने पर है। निठारी हत्याकांड, आरुषि हत्याकांड, कामनवेल्थ घोटाले और 2जी घोटाले में इसे स्पष्ट देखा जा सकता है। सीबीआई ने चार्जशीट फाइनल करने के पहले जांच अधिकारी से लेकर निदेशक तक लिखित राय लेने की परंपरा रही है। इस कारण सीबीआइ के मामलों में आरोपितों की सजा की दर 70 प्रतिशत से अधिक है, जो सामान्य पुलिस की तुलना में काफी बेहतर है। बड़े मामले में निचली अदालत से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक से फटकार और आरोपितों का बरी होना प्रणालीगत विफलता है। आबकारी घोटाले में सीबीआई की चुनौती पर हाई कोर्ट में सुनवाई कब शुरू होगी और उसका फैसला कब आएगा, इसे कोई नहीं जानता। सीबीआई को अपनी कार्यप्रणाली को लेकर आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है। केंद्र सरकार को भी सीबीआई की कार्यप्रणाली को लेकर जो टिप्पणी न्यायालय ने की है उसको ध्यान में रख व्यवस्था में सुधार लाने की आवश्यकता पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। सरकार को समझना होगा कि सीबीआई जैसी जांच एजेंसी की असफलता सरकार की छवि को भी धूमिल करती है।