डीयू के दीक्षांत में 1.20 लाख छात्रों को प्रदान की गयी डिग्रियां, उपराष्ट्रपति ने दिया राष्ट्र प्रथम का मंत्र

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नई दिल्ली{ गहरी खोज }: उपराष्ट्रपति एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलाधिपति सीपी राधाकृष्णन ने शनिवार को विश्वविद्यालय के 102वें दीक्षांत समारोह में 1,20,408 विद्यार्थियों को डिजिटल डिग्रियां प्रदान कीं। उन्होंने कहा कि डिग्री केवल प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता है। उन्होंने युवाओं से “राष्ट्र प्रथम” को जीवन का मार्गदर्शक सिद्धांत बनाने का आह्वान किया।
विश्वविद्यालय के बहुउद्देशीय खेल परिसर में आयोजित समारोह में 734 शोधार्थियों को पीएचडी की उपाधि भी प्रदान की गई, जबकि 132 गोल्ड और सिल्वर मेडल तथा पुरस्कार वितरित किए गए। उपराष्ट्रपति ने 10 प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को व्यक्तिगत रूप से मेडल प्रदान किए और ‘बुक ऑफ हाइलाइट्स’ का विमोचन भी किया।
समारोह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय की 104 वर्ष लंबी गौरवशाली यात्रा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1922 में मात्र तीन कॉलेज, दो संकाय, आठ विभाग और 750 विद्यार्थियों के साथ शुरू हुआ यह संस्थान आज 16 संकायों, 86 विभागों, 90 कॉलेजों, 20 हॉल एवं छात्रावासों, 30 से अधिक केंद्रों एवं संस्थानों, 34 पुस्तकालयों और छह लाख से अधिक विद्यार्थियों के साथ वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान स्थापित कर चुका है।
उन्होंने विश्वविद्यालय की निरंतर बेहतर होती राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि यह उसकी शैक्षणिक उत्कृष्टता का प्रमाण है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में विश्वविद्यालय विश्व के अग्रणी शिक्षण संस्थानों में और ऊंचा स्थान प्राप्त करेगा।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि दीक्षांत केवल औपचारिक समारोह नहीं, बल्कि जीवन के एक चरण की पूर्णता और दूसरे चरण की शुरुआत है। आज के स्नातक ऐसे समय में नई जिम्मेदारियों की दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं, जब प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक लोकतांत्रिक चुनौतियां विश्व व्यवस्था को बदल रही हैं।
उन्होंने कहा, “डिग्री केवल सर्टिफिकेट नहीं, बल्कि समाज की सेवा करने, राष्ट्र के उत्थान के लिए अपने कौशल का उपयोग करने और राष्ट्र प्रथम के सिद्धांत को अपनाने की प्रतिबद्धता है।” उपराष्ट्रपति ने ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्ण होने पर भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की परिकल्पना में युवाओं की भूमिका निर्णायक होगी। आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल आर्थिक स्वावलंबन नहीं, बल्कि नवाचार, अनुसंधान, उद्यमिता और भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप विकसित करना है। उन्होंने कहा कि चाहे विद्यार्थी वैज्ञानिक बनें, सिविल सेवक, उद्यमी, कलाकार, शिक्षक या विधि विशेषज्ञ—वे भारत 2047 के निर्माण के वास्तुकार होंगे।
उपराष्ट्रपति ने यह बताते हुए प्रसन्नता व्यक्त की कि इस वर्ष 50 प्रतिशत से अधिक स्नातक और 70 प्रतिशत से अधिक गोल्ड मेडल विजेता महिलाएं हैं। उन्होंने इसे देश में महिला शिक्षा के उल्लेखनीय विस्तार का प्रमाण बताया और सभी छात्राओं को विशेष बधाई दी। इस दौरान उपराष्ट्रपति ने विद्यार्थियों से “ड्रग्स को ना” कहने और सोशल मीडिया का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सीखने की प्रक्रिया जीवन भर चलती है और ज्ञान के साथ संवेदनशीलता तथा सेवा भाव ही सच्ची सफलता का आधार हैं।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय ने द्वितीय विश्व युद्ध और कोविड-19 जैसी चुनौतियों के बावजूद हर वर्ष दीक्षांत समारोह आयोजित कर अपनी अकादमिक प्रतिबद्धता को बनाए रखा है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि यह देश हमारा है और इसकी चिंता भी हमें ही करनी होगी। उन्होंने विश्वविद्यालय के ध्येय वाक्य “निष्ठा धृति: सत्यम्” और ‘राष्ट्र प्रथम’ को जीवन का मार्गदर्शक बनाने का संदेश देते हुए समाज, राष्ट्र और मानवता के प्रति उत्तरदायित्व निभाने का आह्वान किया। दीक्षांत समारोह में विश्वविद्यालय के डीन, विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, अधिकारी, कर्मचारी, विद्यार्थी और उनके अभिभावक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

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