इरविन खन्ना संपादकीय { गहरी खोज }: 13 फरवरी को प्रधानमंत्री कार्यालय विधिवत रूप से अब नवर्निमित सेवा तीर्थ परिसर में स्थानांतरित हो गया है। सेवा तीर्थ से अपने पहले संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पुरानी इमारतें गुलामी की मानसिकता में जकड़ी हुई थीं। उन्होंने कहा कि सेवा तीर्थ, कर्तव्य भवन विकसित भारत की यात्रा में महत्वपूर्ण मील के पत्थर हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और केन्द्रीय सचिवालय के नए भवन नागरिक-केंद्रित शासन एवं राष्ट्रीय प्रगति के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि इन इमारतों का निर्माण भारत के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किया गया है। प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम ‘सेवा तीर्थ’ रखा गया है जबकि केंद्रीय सचिवालय की दो इमारतों को ‘कर्तव्य भवन’ 1 और 2 कहा जाएगा। भवन में सेवा तीर्थ के नीचे ‘नागरिक देवो भवः’ भी लिखा गया है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने एक स्मारक डाक टिकट और एक सिक्का भी जारी किया, जिस पर नई इमारत, सेवा तीर्थ, का नाम अंकित है। मोदी ने कहा कि आज जब ‘भारत रिफार्म एक्सप्रेस पर सवार है और भारत अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की नई गाथा लिख रहा है। भारत नए-नए ट्रेड समझौते कर संभावनाओं के नए दरवाजे खुल रहे हैं और देश संतृप्ति के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है तो सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवनों में आप सबके काम की नई गति और आपका नया आत्मविश्वास देश के लक्ष्यों को प्राप्त करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि सेवा तीर्थ, कर्तव्य भवन विकसित भारत की दिशा में भारत की यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। उन्होंने कहा कि साउथ ब्लाक और नार्थ ब्लाक जैसी ऐतिहासिक इमारतें, ब्रिटिश साम्राज्य के आदशों को मूर्त रूप देने के लिए बनाई गई थीं, लेकिन सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन का निर्माण देश की जनता की आकांक्षाओं को साकार करने के लिए किया गया है। मोदी ने कहा कि आजादी के बाद, देश के भविष्य को आकार देने वाले कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए और प्रमुख नीतियां साउथ ब्लाक और नार्थ ब्लाक जैसी इमारतों में विकसित की गई। हालांकि, यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि ये संरचनाएं मूल रूप से अंग्रेजों के प्रतीक के रूप में बनाई गई थीं। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे देश विकसित भारत की ओर बढ़ रहा है, यह महत्वपूर्ण है कि भारत औपनिवेशिक मानसिकता की हर निशानी को छोड़ दे। मोदी ने कहा कि विकसित भारत की राह पर बढ़ रहे देश के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि वह गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर आगे बढ़े। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के बाद भी गुलामी के प्रतीक यहां मौजूद हैं। मोदी ने आज कहा कि हर कोई एक नए इतिहास के निर्माण का साक्षी बन रहा है और यह दिन, 13 फरवरी, भारत के विकास के सफर में एक नई शुरुआत का गवाह बन रहा है। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में विजय एकादशी को बहुत महत्व दिया गया है। इस दिन, जिस भी संकल्प के साथ कोई आगे बढ़ता है, वह निश्चित रूप से विजय दिलाती है। आज हम सभी एक विकसित भारत के निर्माण के संकल्प के साथ सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन में प्रवेश कर रहे हैं। हमारे लक्ष्य में विजय प्राप्त करने का दिव्य आशीर्वाद हमारे साथ है। उन्होंने कहा कि रेस कोर्स रोड, जहां प्रधानमंत्री का आवास स्थित है, का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग कर दिया गया है और यह केवल नाम परिवर्तन नहीं है बल्कि सत्ता की मानसिकता को सेवा की भावना में बदलने का एक प्रयास भी है। उन्होंने कहा कि नाम बदलने की पहल महज शब्दों का परिवर्तन नहीं है। इन सभी प्रयासों के पीछे स्वतंत्र भारत की स्वतंत्र पहचान का एक ही वैचारिक सूत्र निहित है। उन्होंने कहा कि इस बदलाव के बीच निश्चित तौर पर पुराने भवन में बिताए गए वर्षों की स्मृतियां हमारे साथ रहेंगी। अलग-अलग समय पर वहां से कई महत्वपूर्ण फैसले किए गए, वहां से देश को नई दिशा मिली है। वह परिसर, वह इमारत भारत के इतिहास का अमर हिस्सा है, इसलिए हमने उस भवन को देश के लिए समर्पित म्यूजियम बनाने का फैसला किया है। 2014 में जब से नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री का पद संभाला है, से लेकर आज तक देश में एक सकारात्मक परिवर्तन का दौर चल रहा है। तुष्टिकरण की नीतियों के साथ-साथ अंग्रेजी हकूमत द्वारा बनाई नीतियों और कानूनों का त्याग किया जा रहा है और उसकी जगह देशहित व राष्ट्रीय संस्कृति को प्राथमिकता देने वाली नीतियों पर कार्य सरकार कर रही है। जब हम 2047 तक एक विकसित भारत के सपने को साकार करना चाहते हैं तो हमें गुलाम मानसिकता को तो त्यागना ही होगा। साथ में विकसित भारत के सपने को साकार करने के लिए संकल्प ले कार्य भी करना होगा। सरकार ने 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हमारे सामने रखा है उसे साकार करने के लिए सरकार अपने स्तर पर कार्य कर रही है। लेकिन यह संकल्प तभी पूरा होगा जब समाज भी अपने कर्तव्य को समझ कर राष्ट्रहित में कार्य करेगा। नई संसद और सेवा तीर्थ जैसी इमारतें देश के इतिहास में मील पत्थर तो हैं ही साथ में हमारी प्रेरणा के स्त्रोत भी हैं।