अंतरिम व्यापार समझौते पर सहमति तो शुरुआत है
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: दो देशों के बीच जब व्यापारिक समझौते होते हैं तो यह एक दो दिन का काम नहीं होता है। इसको अंतिम रूप देने में कई महीनो तथा कई बार तो सालों लग जाते हैं,एक सरकार के समय बात शुऱू होती है और दूसरी तीसरी सरकार के समय समझौता हो पाता है। इसमें दोनों देश अपने फायदे के साथ ही दूसरे देश के फायदे के बारे में सोचते हैं. उनको फायदा चाहिए तो उनको फायदा देना भी पड़ता है, कोई भी व्यापार समझौता ऐसा नहीं होता है कि एक देश को फायदा हो और दूसरे देश को नुकसान हो। खासकर जब अमरीका व भारत जैसे दो बड़े देशों के बीच जब व्यापार समझौता होता है।उसमें वक्त लगना स्वभाविक है।अमरीका जैसा देश जो विश्व का नंबर वन अर्थव्यवस्था वाला देश है, वह बड़ा होने के कारण कोशिश तो करेगा ही भारत चौथे नंबर की अर्थव्यवस्था होने के कारण उसकी बात ज्यादा माने,अमरीका ने इसके लिए कई तरह से दवाब भी डाला लेकिन भारत दबाव में नहीं आया।
इसी वजह भारत व अमरीका के बीच बातचीत तो होती रही, भारत पर दबाव भी डाला जाता रहा लेकिन अमरीका भारत को झुका नहीं पाया ।उसे आखिर में महीनों के बाद भारत की बात माननी पड़ी। क्योंकि भारत ने तो तय कर रखा था कि अगर ट्रंप के शासन में अमरीका व भारत व्यापार समझौता नहीं होता पाता तो वह अगली सरकार का इंतजार करेगा और अमरीका से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए वह दूसरे देशों के साथ व्यापार बढ़ाने पर बात करेगा। यानी भारत ने यह संकेत दे दिया कि भारत के लिए अमरीका जरूरी नहीं है, भारत तो अमरीका के बगैर भी अपना काम चला सकता है, भले इसके लिए उसे दूसरे देशों से व्यापार समझौता क्यों न करना पड़े।इसके लिए उसने यूरोपियन यूनियन से समझौता करके दिखा भी दिया कि अमरीका व्यापार समझौते को ज्यादा लंबा खींचेगा तो ऐसा भी हो सकता है कि वह भारत जैसा ब़ड़ा बाजार खो दे और भारतीय बाजार में दूसरे देशों का महत्व बढ़ जाए।
भारत व यूरोपियन यूनियन के बीच दो दशक पुराना समझौता कुछ महीनों के भीतर हो जाने से अमरीका के राष्ट्रपति को लगा कि अगर वह समझौते को और ज्यादा खींचेगा तो उसे ही ज्यादा नुकसान होगा। उसके हाथ से भारत जैसा बड़ा बाजार निकल जाएगा और हो सकता है इसका फायदा चीन व रूस उठा लें। भारत ने पिछले कुछ महीनों मे चीन व रूस से अपने संबंधों को और मजबूत किया भी है. यही वजह है कि खुद अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप को ही अचानक एक दिन भारत के पीएम मोदी से फोन पर बात करनी पड़ी और यह घोषणा भी करनी पड़ी कि भारत पर लगाया गया पचास प्रतिशत का टैरिफ हटा कर १८ प्रतिशत कर दिया गया है।भारत के सामने झुके ट्रंप इसलिए उनको बहाना बनाना पडा़ कि भारत रूस से तेल खरीदी बंद करने पर सहमति जताई है, इसलिए टैरिफ घटाकर १८ प्रतिशत किया गया है, भारत नही झुका इसलिए पीएम मोदी ने ऐसा कुछ नहीं कहा,उन्होंने कहा कि जब दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और दुनिया के दो बड़े लोकंतत्र मिलकर काम करते हैं तो इसका लाभ हमारे लोगों को मिलता है।
इसके बाद शनिवार को अंतरिम व्यापार समझौते से सहमति बनाने की दोनों देशों की घोषणा से यह साफ हो गया कि आने वाले दिन मे दोनों देश व्यापार को आसान बनाने के लिए और जो कुछ करना होगा वह करेंगे यानी आगे चलकर बड़ा और स्थायी व्यापार समझौता करेंगे। इससे यह साफ हो गया है कि देश के किसानों के हितों की रक्षा करने में मोदी सरकार सफल रही है।वाणिज्य व उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा भी है कि यह अतंरिम समझौता किसानों के हितों की रक्षा के प्रति देश की प्रतिबध्दता को दर्शाता है।यानी साफ हो गया है कि भारत संवेदनशील कृषि व डेयरी उत्पादों पर अमरीका को कोई टैरिफ रियायत नहीं देगा। कांग्रेस अब तक यही प्रचार कर रही थी कि पीएम मोदी ट्रंप के सामंने झुक गए हैं, इससे देश के किसानों को नुकसान होगा। लेकिन अब कांग्रेस नेता जयराम कह रहे हैं कि समझौते से अमरीका के किसानों को फायदा होगा तथा भारत के किसानो को कोई फायदा नहीं होगा।
हो सकता है कि विपक्षी दल आने वाले समय मे देश के मोदी विरोधी किसान संगठनों को इस समझौते के विरोध में प्रदर्श करने को तैयार कर लें और देश को बताने का प्रयास करें कि देश के किसान इस समझौते के विरोध में हैं क्योंकि इससे देश के किसानों को नुकसान हो सकता है लेकिन आने वाले दिनों से जैसे जैसे दोनों के देशों के बीच कौन किसकाे किस क्षेत्र में क्या क्या रियायते देगा, यह साफ होता जाएगा तो देश के किसानों व लोगों को भी यह बात समझ में आ जाएगी की इस समझौते से दोनों देशों को फायदा होगा विपक्ष जो एकतरफा भारत के नुकसान की बात कर रहा है, वह झूठ है और वह हमेशा की तरह झूठ की राजनीति कर रहा है और इसका उसे कोई लाभ नहीं मिलने वाला है।
