एंटी नार्कोटिक्स टास्क फोर्स गठन सराहनीय फैसला तो है
सुनील दास
संपादकीय { गहरी खोज }: वैसे तो अवैध शराब,गांजा सहित सूखा नशा कई राज्यों के लिए बड़ी चुनौती है लेकिन कई राज्यों से घिरे होने के कारण छत्तीसगढ़ के लिए यह एक जटिल चुनौती है। पुलिस इनकी तस्करी रोकने अपने स्तर पर प्रयास करती है लेकिन वह सफल नहीं हो पाती है, जितनी नशे का सामान वह पकड़़ती है, जब्त करती है,उससे कई गुना नशे का सामान राज्य से होकर दूसरे राज्य चला जाता है और कई राज्यों से नशे का सामान छत्तीसगढ़ भी पहुंच जाता है। नशे के सामान की अवैध बिक्री रोकने के लिए आबकारी व पुलिस वाले तो हैं लेकिन वह पूरी तरह नहीं रोक पाते हैं क्योंकि पुलिस व आबकारी विभाग भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है।वहां ऊपर से नीचे तक व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण प्रदेश को नशामुक्त करने की योजना तो बनाई जाती रही है लेकिन योजना सफल नहीं होती है तो इसीलिए पुलिस व आबकारी में बहती गंगा में हाथ धोने का मोह से बहुत कम लोग बचे पाते हैं।
कोई विभाग जितना पुराना होता है, उसके कर्मचारी जितने पुराने हो जाते हैं, समय के साथ वह बहती गंगा में हाथ धोने को बुरा नही मानते हैं. होता यह है कि ईमानदार आदमी भी ऐसे में ज्यादा दिन ईमानदार नहीं रह पाता है, उसे ईमानदार रहने नहीं दिया जाता है या वह खुद ही औरों जैसा हो जाना ठीक समझने लगता है।इससे तस्करों व विभाग के लोगों के बीच बरसों का एक संबंध बन जाता है तो इसी संबंध के चलते नशे के हर तरह के अवैध धंधे को रोक पाना संभव नहीं रहता है।कार्रवाई के नाम पर कभी कभी अभियान चला दिया जाता है, कुछ लोगों को गिरफ्तार कर दिखा दिया जाता है कि देखों हम तो नशे के धंधे को समाप्त करने के लिए क्या कुछ नहीं कर रहे हैं। आंकड़ो के आधार पर देखा जाए तो पांच साल में पांच हजार लोगों पर कार्रवाई की गई है।रायपुर में वर्ष २५ के दौरान नशा तस्करी के ५५० से अधिक आरोपियों को जेल भेजा गया है।अगस्त २५ में रायपुर पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडीकेट का भंडाफोड़ किया था और एक करोड़ रुपए से अधिक की हेरोइन जब्त की थी।
छत्तीसगढ़ की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि यह नशे का सामान की तस्करी करने वालों के वरदान जैसी है।छत्तीसगढ़ से ओडिशा, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, यूपी, मप्र, झारखंड और महाराष्ट्र की सीमा लगती है।इसी वजह से छत्तीसगढ़ होकर नशे का बहुत सारा सामान जाता है और यहां भी बड़ी मात्रा में खपाने का प्रयास किया जाता है।माना जाता है कि ओडिशा के मलकानगिरी व काेरापुट से गांजा व हशीश छत्तीसगढ़ से ही होकर जाता है। जशपुर के रास्ते ब्राउन शुगर की सप्लाई होती है। जो पंजाब से लाई जाती है।मप्र यूपी सीमा से डोडा वअफीम की तस्करी होती है।राज्य में कई जगह एमडीेएमए व हशीश आयल की तस्करी से संकेत मिल रहे हैं कि यहां नशे के नए सामान भी खपाने का प्रयास हो रहा है। पिछली सरकारों ने परंपरागत रूप से नशे के सामान की तस्करी रोकने के लिए जो महकमा था उसके जरिए ही इसे रोकने का प्रयास किया। ऐसे प्रयासों से लगता जरूर है कि सरकार नशे का धंधा करने वालों के खिलाफ कुछ कर रही है लेकिन इससे नशे का धंधा कभी खत्म नहीं होता है।नशे का धंधा करने वालों को मालूम है कि छत्तीसगढ़ में नशे का धंधा कैसे किया जा सकता है।पुलिस व आबकारी वालों को भी मालूम है कि इस धंधे के बंद हो जाने से उनको कोई फायदा नहीं है इसलिए वह भी वही करते हैं जिससे उनको फायदा होता है।
छत्तीसगढ़ में साय सरकार नशे की तस्करी रोकने कुछ नया करने का प्रयास कर रही है। साय सरकार ने प्रदेश में मादक पदार्थों की तस्करी और नशे के जाल को पूरी तरह समाप्त के लिए निर्णायक कदम उठाने का सराहनीय फैसला किया है।उसने राज्य को नशामुक्त बनाने के लिए फैसला किया है कि रायपुर,बिलासपुर व दुर्ग सहित दस संवेदनशील जिलों में एंटी नार्कोटिक्स टास्क फोर्स का गठन किया जाएगा। यह काम तो पहले हो जाना था क्योंकि राज्य में हुए डीजी आईजी कान्फ्रेंस के दौरान पीएम मोदी व गृहमंत्री अमित शाह ने ड्रग आतंकवाद से निपटने समन्वित रणनीति पर जोर दिया था।अमित शाह ने तो कहा था नशे के तस्करों के खिलाफ कार्रवाई तो हो साथ ही उनकी अवैध संपत्ति भी जब्त करने का काम तेजी से किया जाए। ऐसा राज्य में कम ही किया जा रहा है। पहले की तुलना मे गांजा तस्करों की सजा तो सुनाई जा रही है लेकिन माना जा रहा है कि जेल भेजे गए तस्करों की संपत्ति जब्त करने में कोताही की जा रही है।प्रदेश को साय सरकार को नशामुक्त करना है तो अमित शाह ने जैसा कहा है वैसा करना होगा। यानी तस्कर पकडे जाएं, सजा हो और उनकी अवैध संपत्ति जब्त भी की जाए।
