यूजीसी के नए नियम पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी स्वागतयोग्य : शांता कुमार
शिमला{ गहरी खोज }: पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री शांता कुमार ने यूजीसी द्वारा बनाए गए नए नियम पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि अदालत ने इस नियम पर रोक लगाकर सही दिशा में कदम उठाया है। शांता कुमार ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यह नियम समाज को पीछे की ओर ले जाने वाला है, जबकि भारत का लक्ष्य जाति-विहीन समाज की स्थापना होना चाहिए।
शांता कुमार ने बुधवार को एक बयान में कहा कि यह इतिहास का कड़वा सत्य है कि जिस समाज ने वेदों और उपनिषदों की रचना कर विश्व को महान आध्यात्मिक ज्ञान दिया, वही समाज बाद में सदियों तक विदेशी गुलामी का शिकार रहा। इसका मुख्य कारण समाज का जातियों में बंट जाना था। उन्होंने कहा कि अपने ही समाज ने कुछ वर्गों को अछूत मानकर तिरस्कृत किया, जबकि बाहर से आए आक्रमणकारियों ने उन्हें गले लगाया। जातिवाद और कुछ नेताओं के अहंकार के कारण भारतीय समाज टूटा और लंबे समय तक गुलामी झेलनी पड़ी।
उन्होंने कहा कि आज भारत की सबसे बड़ी समस्या जाति आधारित आरक्षण है, जिससे जातिवाद और अधिक मजबूत हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय तीन बार आरक्षित वर्गों में क्रीमी लेयर को बाहर करने की आवश्यकता पर जोर दे चुका है, लेकिन आरक्षण का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा है। प्रभावशाली वर्ग इसका अधिक लाभ उठा रहे हैं।
शांता कुमार ने आर्थिक असमानता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारत विश्व के लगभग 130 देशों में से पांच सबसे अमीर देशों में शामिल है, लेकिन दुनिया के सबसे अधिक गरीब और भूखे लोग भी भारत में रहते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की समस्या गरीबी नहीं, बल्कि बढ़ती आर्थिक विषमता है। विकास हो रहा है, लेकिन उसके साथ-साथ अमीर और गरीब के बीच की खाई भी तेजी से बढ़ रही है।
उन्होंने इस स्थिति की तुलना एक ऐसे परिवार से की, जिसमें कुछ बच्चे आलीशान कारों में घूमते हैं, जबकि कुछ बच्चों को नंगे पैर चलना पड़ता है। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में अंत्योदय योजना शुरू कर इस विषमता को कम करने का प्रयास किया गया था।
शांता कुमार ने कहा कि आज भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता तेजी से बढ़ती आर्थिक विषमता को दूर करना है ताकि समाज में वास्तविक समानता और सामाजिक न्याय स्थापित किया जा सके। शांता कुमार ने कहा कि हिमाचल और राजस्थान में अंत्योदय योजना शुरू करके इस विषमता को दूर करने की कोशिश की गई थी
