‘वास्तव में असाधारण और वंचितों के कवि’: साहित्य जगत ने विनोद कुमार शुक्ला के निधन पर जताया शोक
नई दिल्ली { गहरी खोज }: प्रतिष्ठित हिंदी लेखक और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता विनोद कुमार शुक्ला के निधन पर लेखकों, कवियों और राजनीतिक नेताओं ने गहरा शोक व्यक्त किया। उन्हें “वास्तव में असाधारण लेखक” और “वंचितों के कवि” के रूप में याद किया गया। शुक्ला का मंगलवार शाम को रायपुर के एक सरकारी अस्पताल में उम्र संबंधी बीमारियों के कारण निधन हो गया। 1 जनवरी को उनकी उम्र 89 वर्ष पूरी होने वाली थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने X पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि शुक्ला को “हिंदी साहित्य की दुनिया में उनके अमूल्य योगदान” के लिए हमेशा याद किया जाएगा। प्रधानमंत्री ने लिखा, “प्रसिद्ध लेखक विनोद कुमार शुक्ला जी के निधन से अत्यंत दुःख हुआ, जिन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इस दुःख की घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिवार और प्रशंसकों के साथ हैं। ॐ शांति।”
हिंदी लेखक चंदन पांडे ने उनके निधन को “अपरिवर्तनीय क्षति” बताया और कहा कि बीमार रहने के दौरान भी साहित्यिक समुदाय उनसे और अधिक रचनाएँ मिलने की उम्मीद करता रहा। पांडे ने कहा, “जितना समय उन्हें मिलता, उतना वह लिखते और हम पढ़ते। इस आशा के साथ सबने चमत्कार की उम्मीद की। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसलिए यह एक अपरिवर्तनीय क्षति है।”
विनोद कुमार शुक्ला का जन्म 1 जनवरी 1937 को राजनांदगांव (अब छत्तीसगढ़) में हुआ था। उन्होंने नौकर की कमीज़, खिलेगा तो देखेंगे, दीवार में एक खिड़की रहती थी, और एक चुप्पी जगह जैसी चर्चित कृतियाँ लिखीं।
लेखक प्रेम जनमेजय ने उन्हें “वंचितों और निराश लोगों के साथ खड़े रहने वाला कवि” बताया। उन्होंने कहा, “उनका सृजनशीलता हर निराश आत्मा को संबल देती रहेगी। उनका होना ही यह भरोसा देता था कि वंचितों का हाथ अब भी जीवित है।”
शुक्ला का साहित्य भारत के गरीब और मध्यम वर्ग के जीवन को दर्शाता था, जिसमें रोजमर्रा की वास्तविकताओं के साथ सामाजिक गहराईयों का अन्वेषण होता था। उन्हें दीवार में एक खिड़की रहती थी के लिए 1999 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और इस वर्ष नवंबर में 59वां ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। लेखक प्रभात रंजन ने कहा कि शुक्ला “सच्चे मौलिक हिंदी लेखक थे, जिनकी लेखनी का कोई तुलनीय नहीं।” उन्होंने बताया कि शुक्ला ने वंचित समाज के दुःख नहीं बल्कि उसकी खुशियों को दिखाया।
नौकर की कमीज़ को 1999 में मणि कौल ने फिल्म रूपांतरित किया। सरल, संवादात्मक हिंदी में शुक्ला की कहानियों ने घरेलू परिचितता को अन्याय, मानवीय गरिमा, अलगाव और हानि पर गहरे चिंतन के साथ जोड़ा। कवि लक्ष्मी शंकर बाजपेई ने शुक्ला को “युवा पीढ़ी के लिए आदर्श स्कूल” बताया। उन्होंने कहा कि सरल भाषा और संवादात्मक शैली के माध्यम से उन्होंने घर और परिवार की बातें करते हुए बड़े और गहन दार्शनिक प्रश्न उठाए। लेखक मैत्रेयी पुष्पा ने उन्हें “लेखन का चैंपियन” बताया, जबकि मृदुला गर्ग ने कहा कि उनकी “तीक्ष्ण दृष्टि समाज में हो रही हर ग़लती पर” थी।
अशोक महेश्वरी (राजकमल प्रकाशन) ने कहा कि शुक्ला ने “साधारण लोगों और उनके जीवन की असाधारणता को साहित्य के विशाल कैनवास पर चित्रित किया।” उन्होंने कहा कि शुक्ला की रचनाएँ हमेशा उनके कार्यों और स्मृतियों में जीवित रहेंगी।
